KIDS vs PARENTS

आजकल के शरारती बच्चे फोन से ऐसे चिपके रहते हैं जैसे चींटी शहद पर टूट पड़ती है। रीता एक अनुभवी सामाजिक शोधकर्ता थी, जो पिछले आठ सालों से आठ साल से कम उम्र के बच्चों के मानसिक विकास पर गहराई से अध्ययन कर रही थीं। हर दिन वह अलग-अलग घरों में जाकर बच्चों के व्यवहार, प्रतिक्रियाओं और दिनचर्या का अवलोकन करती थी। लेकिन उस दिन जो उसने देखा, वो उससे पहले कभी नहीं देखा था। एक घर में बच्चा अपनी मां पर चिल्ला रहा था, "फोन दो! अभी दो!" मां ने थककर फोन उठाया और सीधे पानी में डाल दिया। रीता हैरान थी – लेकिन यहीं बात खत्म नहीं हुई। दूसरे घर में एक और बच्चा गुस्से से लाल था, जब उसके पेरेंट्स उससे फोन मांगते तो वह फोन टॉयलेट में फेंक देता है। एक और घर में मामला और भी अलग था वहां पिता ने फैसला ही कर लिया था कि अगर चैन चाहिए तो फोन की बलि देनी होगी। उन्होंने फोन बेच दिया, ताकि घर में शांति लौट सके। रीता ने इन सारे अनुभवों को अपनी डायरी में दर्ज किया – बच्चे और मोबाइल के बीच पनपती एक आदत, जो अब खेल-कूद और कल्पनाओं की जगह ले रही थी। अब सवाल था - क्या बच्चों का बचपन स्क्रीन से दूर रखना चाहिए? अगले भाग के लिए प्रतिक्रिया दें।